Learnings From Bhagavad Gita

जय श्री कृष्ण 🙏 मैं अपना कर्म आरंभ करता हूँ

Note: This post will be regularly updated, keep coming back for absorbing the eternal knowledge of Bhagavad Gita

भागवद गीता को दुनिया का सबसे महानतम ग्रंथ मना जाता है, इस दुनिया में शायद ही कोई ऐसा धर्म ग्रंथ होगा जिसके बारे में इतना लिखा गया होगा।

भागवद गीता वर्तमान के समय मे एक मार्गदर्शक की तरह है जो भटके हुए राही को सही राह दिखता है।

चाहे आप दुनिए के किसी भी संकट, दुविधा या परेशानी में क्यों न फंसे हो, भागवद गीता आपको सही राह दिखाएगा। दुनिया के हर प्रश्न, दुविधा का उत्तर भागवद गीता में है – मुझे आज्ञा दीजिये की में आप तक भागवद गीता के अपार ज्ञान को आप तक पहुंचा सकूँ।

जय श्री कृष्ण 🙏

अध्याय 1 – अर्जुनविषादयोग

पहला अध्याय शुरू होती है धृतराष्ट्र के सवालों से, वे जानना चाहते हैं कि दुर्योधन की सेना क्या कर रही है और पाण्डु पुत्रों की सेना क्या कर रही है, उसके बाद आता है दोनों सेना के शूरवीरों का वर्णन, उसके बाद अर्जुन का विषाद

  1. Always do the right thing, no matter what.. Whenever we are doing something wrong, we know in our minds that we are doing wrong
  2. Always analyse your Competitors, problems, and compare yourself to your Competitors. We should know each and every part of our problem. We should always know each and everything about our problems.
  3. We also have to know all the strong points and weak points of ourselves, SWOT analysis
  4. We should always study each and everything about our problem, to combat that effectively because surprise can make us lose war.
  5. Apki Hunar, himmmat, mehnat,sanghi, rishtedar humare liye hamesha khade rahenge
  6. घमंड कभी न करें – ये हारने की शुरुवात है, कभी शत्रु को underestimate न करें
  7. Agar yuddh ka faisla le liya jaye ya yuddh start ho jaye toh uske baad peeche nahi hatna chahiye
  8. Protect the most important thing in your war, until you win.
  9. युद्ध जीतने के लिए माहौल बनाना पड़ता है, वैसे ही वातावरण बनाने पड़ता है, apne aap ko motivate karte rehna chahiye
  10. हर युद्ध, हर चुनौती नए challenges लेके आती हैं, उनके हिसाब से हमे तैयार रहना चाहिए
  11. हमे हमेशा, har din अपने आप को motivate करते रहना चाहिए
  12. Do whatever that motivates you and get ready for a war.
  13. Motivation सबको चाहिए युद्ध जीतने के लिए
  14. सच्चा योद्धा हर चुनौती के लिए तैयार रहता है aur waqt aane pe un chunautiyon se ladhta bhi hai
  15. आपकी प्रतिभा ऐसा होनी चाहिए कि सामने वाला आपकी कौशल से प्रभावित हो जाये, first impression best दीजिये, युद्ध से पेहोए अपने शत्रु को दहाड़ से दराइये, ये हुंकार ऐसी होने चाहिए के शत्रु सोचे कि ये में किस्से युद्ध करने जा रहा हु
  16. जिसके साथ धर्म होता है वो कभी हार नहीं सकता isiliye Arjun ne Shri Krishna ko chuna
  17. जब तक आप अपने समस्या के बीच मे नही जाएंगे tab तक आप अपनी समस्या को पूरी तरह नहीं समझ पाएंगे, apni samasya ko poori tarah samajhne ke बाद निर्णय लेना चाहिए
  18. युद्ध तभी करना चाहिए जब आप अपने शत्रु को अच्छे से जान परख लें
  19. युद्ध की बात करना आसान होता है, aur युद्ध करना मुश्किल – pariksha ke waqt bhi aisi hi ghabrahat hoti hai
  20. जब युद्ध मे पता नही हो कि क्या करना है, तब आप कुछ नही कर सकते – iss samay hume ek marg darshak ki zarurat hoti hai
  21. युद्ध से पहले अगर आपको लगता है कि आप हारने वाले है, आप कापते हैं तब आपको एक mentor की ज़रूरत होती है
  22. Yuddh ke samay aisi bohot si chizen hoti hain jo hamare man ko kamzor karti hain… aur yuddh karne se rokti hain… inhi lakshanon ko hume bhi pehchana hai
  23. जीवन में कई ऐसी घड़ी आती है जहां हमे अपनी सबसे प्रिये चीज़ को त्यागना पड़ता है, अपने goals को achieve करने के लिए
  24. लालच बुरी चीज है
  25. युद्ध से हट गए तब ये आपकी हार मानी जायेगी
  26. जहां परिवार की सम्मान नहीं, वहां किसी का सम्मान नहीं होता – kul ka naash ho jata hai – paap bhi bohot fail jaata hai
  27. परिवार की भलाई उसकी स्त्रियों की निर्भर करती है, agar koi ghar banta hai toh mahila se hi banta hai, जिस घर मे महिला नहीं उस घर का भविष्य नही होता, पाप के बढ़ने से स्त्रियों दूषित हो जाती है, और स्त्रियां दूषित होने से सब खत्म हो जाते हैं
  28. संसार की नियम बड़े सोच समझ के banaye jaate hain इसीलिए purane niyam ko कभी नही तोड़ना चाहिए
  29. वर्णसंकर से जाती, धर्म, समाज का नाश हो जाता है
  30. Galat warno se, galat tarike se santan ki jab utpatti hoti hai tab wo sab kuch khatam kar deta hai
  31. वर्णसंकर corrupt women से उत्पन्न होता है – aur jaati, dharm, kul naash ho jata hai
  32. हमेशा धर्म को मानें, धर्म का पालन करें
  33. Kul ka naam roshan karna purane samay me bohot badi baat mani jaati thi.
  34. Jahan dharm nahi hota wo jagah apne aap hi nark ban jaati hai – aaj ke yug me bhi apko aisi jagah dikh jayengi
  35. Arjun sat down being sad, after seeing their relatives in the battlefield

अध्याय 2 – संख्ययोग

इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन की दुविधा का उत्तर देंगे, यहां से शुरुवात होती है उस ज्ञान की जिसके लिए भागवद गीता दुनिया का सबसे महानतम ग्रंथ और ज्ञान का भंडार मन जाता है।

  1. शत्रु से मोह दिखाना सच्चे योद्धा की निशानी नहीं – अपने कर्म से मुह मोड़ कर बैठना ठीक नहीं – इससे कभी कोई लाभ नहीं होता
  2. मन की दुर्बलता छोड़ हमें सिर्फ उस कर्म के बारे में सोचना चाहिए जो हम करने के लिए आये हैं
  3. दुनिया में कई ऐसे लोग हैं जो सोचते हैं कि परिवार भी न छुटे और मोक्ष भी प्राप्त हो जाये, लेकिन तोह संभव नहीं – कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है
  4. कमज़ोर क्षणों में हम डर जाते हैं जिससे confusion का भाव आता है – इस समय हमें एक mentor की ज़रूरत होती है, गुरु से कुछ छुपाना नही चाहिए तभी वो आपकी मदद कर पायेंगे
  5. जब अपनों का दुख सताता है तोह किसी भी तरह का लाभ सुख नहीं देता, अगर आप शोक में हैं, दुख में हैं, तोह जबतक आप उसका उपाय ढूंढ नहीं लेंगे तबतक दुनिया का कोई भी और सुख आपको सुख नहीं देगा
  6. किस समय कौनसी दुर्बलता हमपे हावी हो जाये ये हमें मालूम नहीं, इसीलिए हमेशा अपना 100℅ देने का कोशिश करें, और जब अर्जुन के ऊपर दुर्बलता हावी हुई थी तोह अर्जुन उस दुर्बलता को जीत के आगे बढा था और उसी तरह हमें भी आगे बढ़ना होगा

भगवान श्री कृष्ण का गीत ज्ञान यहां से आरंभ हो रहा है 👇

आत्मा

  1. यहजो पंडित और ज्ञानी होते हैं वो किसी के जीवित रहने पर या जीवित न रहने पर शोक नहीं करते – अर्थात इससे दुनिया में किसी भी बात का शोक नहीं करना चाहिए
  2. काल का खेल चलता ही रहता है, हर काल में, आने वाले time में भी हमारे जैसे, अर्जुन के जैसे और भगवान श्री कृष्ण के जैसे लोग रहेंगे, और ऐसा ही खेल फिर से होगा
  3. हमारी आत्मा वही रहती है लेकिन शरीर बचपन से बुढापे तक बदलता है, फिर नया शरीर मिलता है नए जन्म होने पर – बदलाव प्रकृति का नियम है – जो नहीं बदलता वो है आत्मा
  4. जिन्हें हमारी इन्द्रियाँ महसूस करती हैं, वो सर्दी, गर्मी, सुख, दुख तोह आते जाते रहते हैं – हमेशा नहीं रहते, भूख, प्यास, सर्दी गर्मी तोह खत्म होगी, लेकिन जो खत्म नही होगी उसे कहते हैं आत्मा
  5. सुख दुख जो बराबर समझे, दोनो हालात में एक जैसा रहे चाहे वो सुख या दुख बोहोत बाद ही क्यों न हो वही जीवन में आगे बढ़ता है, इन्द्रिय जिसको व्याकुल नहीं करते वो मोक्ष के योग्य होता है, सुख दुख तोह आते जाते रहते हैं – एक ही भाव कभी रुक के नहीं रहता
  6. जो झूठ है उसका कोई value नहीं है, value सिर्फ सच का है, समझदार लोग इस बात को समझते हैं, जिसका आना जाना लगा रहे उसके लिए कोई क्या शोक करे, सुख जाता है तोह दुख आता है, और फिर सुख आता है, इन दोनों का आना जाना लगा रहता है, इसी लिए ये दोनों भाव झूठे हैं, इनका कोई value नहीं है, value है तोह सिर्फ आत्मा का जो निरंतर है और सिर्फ वही सच है
  7. सिर्फ आत्मा ही हमेशा के लिए है, बाकी सब कुछ आता जाता रहता है, और यही सबसे बड़ा सच है
  8. भगवान श्री कृष्ण कहते हैं अर्जुन से , तू युद्ध कर, अपना कर्म कर क्योंकि शरीर नाशवान है और आत्मा अमर है, और वही सच्चाई है तोह शोक किस बात का करना
  9. जो आत्मा को मरने वाला समझते हैं वे सच्चाई को नहीं जानते, क्योंकि आत्मा न तोह किसीको मरती है और ना ही किसी के द्वारा मारी जा सकती है, अर्थात आत्मा का होना ही सच है, जो लोग सोचते हैं कि वो लोग बोहोत कुछ कर देंगे ये सिर्फ उनकी नादानी है, अज्ञानता है
  10. आत्मा ना तोह किसी काल में जन्मती है ना तोह किसी काल में मारी जाती है, आत्मा हमेशा रहती है, बाकी सब कुछ आता जाता रहता है, आत्मा को छोड़ कर सब कुछ आएगा और जाएगा
  11. जो पुरुष इस आत्मा को अजन्मा मानता है वो कैसे किसीको मरवा सकता है, जो इस बात को समझता है कि आत्मा ही सबसे बड़ा सच है वो किसी को कैसे मार सकता है , इस बात को समझने का मतलब है ब्रम्ह रूपी सच को समझना, महत्व हमें देना है अपनी आत्मा को जो हमेशा थी और हमेशा रहेगी, नाशवान शरीर को नहीं
  12. जैसे नानुष्य पुराने वस्त्र त्याग कर नए वस्त्र ग्रहण करता है उसी तरह आत्मा भी शरीर बदलता है, एकदम वैसे ही जैसे हम कपड़े बदलते हैं, शरीर की आयु होती है परंतु आत्मा की नहीं
  13. इस आत्मा को शास्त्र नहीं काट सकते, आग नहीं जला सकता, इसको जल नहीं गाला सकता, और वायु सूखा नहीं सकती, आत्मा हमसे पहले भी थी और आगे भी रहेगी
  14. आत्मा स्थिर है, सनातन है और हमेशा रहेगा, हमे आत्मा को समझना होगा तभी हमें मुक्ति मिलनी संभव हौ वार्ना मोह हर माया की इस दुविधा में हम हमेशा फंसे रह जाएंगे, जैसे कि अभी अर्जुन फंसा हुआ है ओपन कर्म करने को तैयार ही नहीं
  15. आत्मा का स्वरूप अव्यक्त है क्योंकि इस आत्मा को हम इन्द्रियों से नहीं समझ सकते, इसको आप सोच भी नहीं सकते, इन्द्रियों की मदद से हम सुख, दुख, सर्दी, गर्मी महसूस करते हैं
  16. आत्मा का ये ज्ञान श्री कृष्ण अर्जुन को इसीलिए दे रहे हैं क्योंकि जिनके लिए वो शोक कर रहा है वो व्यर्थ है, अगर अर्जुन आत्मा को जन्म लेने वाला या मारने वाला मानता है तोह भी युद्ध में मारने वाले के लिए शोक करके कोई मतलब नहीं
  17. श्री कृष्ण कहते हैं के हे अर्जुन अगर तुम मानते हो कि जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है, और मेरे हुए का जन्म निश्चित है तोह इससे भी तुम्हे इस बिना उपाय वाले विषय मे शोक करने का कोई हक नहीं है – कई बार हैम उन बातों के लिए शोक करते हैं जिनका होना तय है, ये समझदारी नहीं है, जो तय है वो होगा ही, और जो होगा ही तोह उसके लिए शोक करके अपने आप को कमज़ोर या दुर्बल बनाने की क्या आवश्यकता है
  18. हे अर्जुन सम्पूर्ण प्राणी जन्म के पहले अप्रकट थे, और मृत्यु के बाद भी अप्रकट हो जाएंगे, केवल बीच में ही प्रकट है फिर ऐसी स्तिथि में शोक क्या करना, जो आता है वो जाता भी है फिर ऐसी स्तिथि मे शोक क्या करना
  19. कुछ लोग ज्ञान की बातें सुनते हैं, लेकिन कुछ देर बाद वापस अपनी मोह माया की दुनिया में लग जाते हैं, इसी मोह माया से तोह निकलना है अगर आप आत्मा को समझना चाहते हैं
  20. हे अर्जुन ये आत्मा सदा ही सबके शरीर में अवध्य है, इस करण तू समपूर्ण प्राणियों के लिए शोक करने योग्य नहीं है, आत्मा को समझना ही मोक्ष की प्राप्ति है

कर्म

  1. तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्म युक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है
  2. अगर हमने किसी काम को करने का निर्णय ले लिया है तोह फिर उस काम से डरना नहीं चाहिए, पूरे तन और मन से उस काम में लग जाना चाहिए
  3. निर्णय के बाद डरने का कोई मतलब नहीं, सिर्फ करने का मतलब है, कर्म करने का
  4. भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही युद्ध, challanges को पाते हैं
  5. युद्ध को, challenge को खुले मन से स्वीकार करने में ही सबसे बड़ी खुशी है, युद्ध, चुनौती, challenges स्वर्ग का खुला हुआ द्वार है
  6. हमको भी अगर अपने जीवन में चुनौती मिलती है, तो उसे मोक्ष मानकर उस challenge को पूरा कर जाने में लग जाना चाहिए
  7. किन्तु यदि तू इस धर्म युक्त युद्ध को नहीं करेगा तोह स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा – अगर हम challange को, युद्ध को, चुनौती को स्वीकार नहीं करेंगे तोह पाप को प्राप्त होंगे
  8. युद्ध करने से अगर मना कर दिया तोह उससे बड़ा अपमान उससे बड़ी बेज़्ज़ती कुछ नहीं हो सकती, कुछ लॉकन की भीड़ में अगर आप जाते हैं तोह लोग आपको सम्मान से देखते हैं, आपकी प्रशंसा करते हैं, और दूसरी स्तिथि में अगर आप कहीं जाते हैं तोह लोग अपमान से देखते हैं, पनई नज़रें फेर लेते हैं – आपको क्या स्वीकार है? अपमान या सम्मान, युद्ध को छोड़ देने का मतलब ही अपमान है
  9. जिनकी दृष्टि में पहले तुम शूरवीर कहलाते थे, दूसरे से ऊपर का दर्जा तुमको जो देते थे, वे महारथी अब तुमको भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे, युद्ध से हट जाने से लोग आपको कायर मानेंगे, और बोहोत अपमान भी होता है, युद्ध में हिस्सा लेना भी एक बोहोत बड़ी बात होती है, और युद्ध में कौशल दिखाना भी, कोई अगर युद्ध से ही मुह फेर ले तोह समाज में उसे कोई जगह नही मिलती
  10. हमारे शत्रु तोह इसी ताक में रहते हैं कि कब हमारी बुराई कर सकें, उन्हें ऐसा मौका क्यों देना – युद्ध से भाग के उन्हें ऐसा मौका क्यों देना? वे इसी ताक में रहते हैं कि कैसे आपको नीचा दिखाया जाए
  11. पूरे जी जान से खेलने पर आप हार जीत की चिंता नहीं करते, क्योंकि आप अपना सब कुछ झोंक चुके होते हैं, जीतने पर नाम होता है, और हारने पर भी आप अपने और दूसरों के मन में सम्मान पाते हैं, क्योंकि आपने धर्म के अनुसार युद्ध किया, इसीलिए अपनी चुनौतियों से कभी भी मुह नहीं मोड़ना चाहिए
  12. जय पराजय लाभ हानि सुख दुख को समान समझ कर युद्ध के लिए तैयार हो जा, युद्ध करने से हे अर्जुन तू पाप को नहीं प्राप्त होगा, अगर आप युद्ध में अपना सब कुछ झोंक भी देंगे तोह अगर आप हर भी जाते हैं तोह तोको दुख नहीं होगा क्योंकि आपने अपना 100% दिया

ऊपर की बातें अर्जुन के लिए ज्ञान योग के वविषय में कही गयीं हैं अब आप इसे कर्मयोग के विषय में सुनो

ज्ञान सोचने और समझने की बात है और कर्म, व्यवहारिक practical काम करने का , दोनो तरीके हैं अपने गंतव्य, मंज़िल या destination तक पहुंचने का

  1. सबके लिए ज्ञान का , साधना का, साधुओं का मार्ग संभव नहीं है, हमारे जैसे ज़्यादातर लोगों को कर्मयोग अपनाना चाहिए, अगर कर्मयोग को समझ कर हम उसपर चल सकें तोह कभी निराश नहीं होगी, अगर हम इस कर्मयोग को थोड़ा सा भी समझ लें तोह जन्म और मृत्यु के डर से हमेशा के लिए बच सकते हैं
  2. कर्मयोग में जब फैसला लेना हो तोह बुद्धि एक ही होती है, लेकिन जहां सोच की, निर्णय की, फैसले की कमी हो वहां कई बुद्धियाँ काम करती हैं और इंसान को भ्रमित, confuse कर देती हैं। जब आप कोई निर्णय, फैसला नहीं ले पाते तोह बोहोत सी दिशाओं में आपकी बुद्धियाँ जाती है, लेकिन जब आप निर्णय करने की सोच लें तोह फिर उसके बाद सिर्फ उस काम को करने का ही प्रण होता है और ऐसा ही होना चाहिए
  3. जो लोग सिर्फ कर्म के फल, लाभमें इच्छा रखते हैं, ऐसे लोग कर्म फल का प्रशंसक होते हैं, जब भी कोई काम उससे होने वाले फायदे से शुरू होता है तोह वो कर्म, काम नहीं स्वार्थ हो जाता है – आप अकर्मी होने से बचें
  4. कर्मफल के प्रशंसक ढोंगी लोग होते हैं – ऐसे ढोंगी लोगों से बचना चाहिए
  5. जो कर्म की बातें सिर्फ भोग और ऐश्वर्य के लिए करते हैं, उन लोगों की परमात्मा में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती, ऐसे लोगों का धेय या लक्ष्य सिर्फ स्वार्थ होता है, फायदा होता है, भगवान या अपने काम में सच्ची लगन नहीं होती, ऐसे लोगों की संगत से बचना चाहिए – इनकी पहचान होती है इनके negative रवैये से, काम में इनकी कोई रुचि नहीं होती, बस उस काम का फल भोगने में इनको बोहोत रुचि होती है
  6. वेद भी सिर्फ 3 गुणों में सीमित हो जाते हैं, उसके आगे है कर्मयोग, भगवान श्री कृष्ण का कहना है कि कर्म करो लेकिन उसके फल से लगाव न रखो
  7. बेहद बड़े जलाशय प्राप्त हो जाने पर, छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, उसी तरह से जिसने ब्रम्ह तत्व को समझ लिया उसके लिए वेदों की कोई आवश्यकता नहीं
  8. कर्मयोग तोह उस बड़े तालाब की तरह है जो एक बार आपको मिल गया तोह फिर आपको छोटे तालाब की आवश्यकता क्यों रहेगी, कर्मयोग का खेल इतना बड़ा है कि उसके आगे सारे ज्ञान छोटे पड़ जाते हैं – लेकिन कर्म को समझना पड़ेगा कि आखिर ये होता क्या है
  9. तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं, इसलिए तू कर्मों के फल के लिए काम मत कर, और ऐसा भी न हो कि तू कर्म ही ना करे, कर्म करना है लेकिन फल के लिए नहीं, उसे अपना धर्म और अपना कर्तव्य समझ कर – गीता के सबसे लोकप्रिय श्लोक में इस श्लोक की गिनती होती है
  10. कर्म के फल की इच्छा मत कर, और ऐसा भी न हो कि तू कर्म ही ना करे, यही निष्काम कर्म की कुंजी, उसकी चाबी, उसका सार है, कर्म के बाद क्या फल मिलेगा इसकी परवाह किये बिना बस पूरी लगन से अपने धर्म और कर्तव्य को पूरा कर
  11. फल की इच्छा को छोड़ के जो निष्काम कर्म योगी होता है वो पाप पुण्य से दूर हो जाता है, जो फल के लिए काम करते हैं उन्हें हमेशा असफल होने का डर रहता है और इसीलिए कभी भी वो कर्म को अच्छे से नहीं कर पाते और फिर उनको फल मिल भी जाता है तोह इसी फल में उलझ जाते हैं, इसीलिए हमें बुद्धि योग की शरण में आना चाहिए, लगन सिर्फ काम में और भगवान में टैब बुद्धि निश्चय से काम कर पाती है
  12. बुद्धि योग के शरण में आने से बिना फल के काम करने वाला इसी दुनिया में पाप पुण्य से मुक्त हो जाता है – अच्छा हो बुरा हो सुख हो या दुख हो , सभी में एक ही तरीके से, समभाव से तू बस अपना कर्म , अपना कर्तव्य करता रह
  13. आम इंसान कर्म करके उसके फल को प्राप्त कर खुश होता है, और उसके बाद दूसरे फल की लालच में फिर से नए कर्म में लग जाता है, इसमे फल के बारे में सोचना ही प्रधान है और यही गलत बात है, अगर आप अपनी सारी शक्ति, क्षमता, और इच्छा सिर्फ कर्म में लगाएं और फल को भूल जाएं तोह आपके ध्यान कर्म में होगा, आप उस कर्म में बेहतर होंगे, आपकी तरक्की होगी और रही बात फल की टोह सोच के देखिये, अगर आपने कर्म किया है तोह फल जाएगा कहां
  14. कर्म के फल का मोह हो या रिश्तों का मोह या ऐश्वर्या का मोह, यही मोह हमें फंसता है, जब बुद्धि मोह के दलदल से निकल जाती है, तब परमात्मा के पास आने की राह निकल आती है। रिश्ते, धन, ऐश्वर्या बुरे नहीं , उनसे मोह बुरा है, क्योंकि जब आपका लगाव इन वस्तुओं से हो जाती है तब सोचने समझने की शक्ति कम हो जाती है, बुद्धि ठीक से काम नहीं करती, फैसले गलत हो जाते हैं, इसीलिए मोह को बुरा बताया गया है, ध्रितराष्ट्र के पुत्र मोह से ही पूरा महाभारत हुआ था, युधिष्टिर के जुए की मोह में उनका पूरा राज्य चला गया था

स्थिर बुद्धि

  1. जितने लोग होते हैं उतने किस्म की बातें होती हैं, और जितनी बातें होती हैं उतने तरीकों से बुद्धि सोचती है, जब दिमाग, बुद्धि, स्थिर होकर परमात्मा में लग जाती हैं तब उसे ही योग कहते हैं, बुद्धि का स्थिर हो जाना ही एकग्रतायानी concentration कहलाता है, स्थिर होकर एकाग्रता से कुछ करने को समाधि की स्तिथि भी कहते हैं, और अगर आपने समाधि की स्तिथि से कुछ काम किया हो तोह वो काम कभी भी व्यर्थ नहीं होगा
  2. अर्जुन पूछते हैं भगवान श्री कृष्ण से की हे केशव , समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिर बुद्धू पुरुष के क्या लक्षण हैं, वह स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? अर्जुन स्थिर बुद्धू वाले लोगों की पहचान जानना चाहता है, जो कि आप भी जानना चाहते होंगे
  3. भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, है अर्जुन , जिस काल में ये पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भली भांति त्याग देता है, और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में, वह स्थित प्रग्न कहा जाता है, भगवान कृष्ण ने बताया था कि आत्मा ही सबसे बड़ी सच्चाई है, मोह, इच्छा, कामना छोड़ना ही आत्मा के पास आने है, जिसको संतुष्टि, शांति के लिए किसी दूसरे के ऊपर निर्भर नहीं रहना पड़ता, वोही अपनी कामना को त्याग सकता है
  4. बुरा होने पर जिसके मन में दुख उत्पन्न न हो, अच्छा होने पर भी जिसका मन शांत रहे जो खुशी से पागल न हो, गुस्सा, डर, या प्रेम, जो सब कुछ एक ही भाव से देखता हो, उसकी बुद्धि स्थिर रहती है, और वही मुनि या योगी कहलाता है
  5. जिसमें लगाव नहीं है, शुभ हो या अशुभ, अच्छा हो या बुरा, जो दोनों को एक जैसे देखता है वही अपनी बुद्धि को स्थिर रखता है – इस श्लोक में भगवान समझ रहे हैं कैसे अलग अलग हालात में अपनी बुद्धि को स्थिर रखा जाए, कैसे सैयाम और धैर्य से हम अपने जीवन में अनुशासन ला सकते हैं, वार्ना चारों तरफ या तोह दुख की हाहाकार होगी या लोग खुशी से झूम रहे होंगे
  6. जैसे कछुआ अपना सारे अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब इंसान इन्द्रियों के विषय से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, टैब उसकी बुद्धि स्थिर होती है, यानी दुनिया में रहकर भी दुनुयादारी से बचना ही बुद्धि को स्थिर करना है, अगर आप किसी के सामने बोहोत ही स्वादिष्ट कहना रख दें, तोह क्या वो खुद को रोक पाएगा? अगर आप किसी के सामने महँगे आभूषण और महँगे digital gadgets रख दें, तोह क्या वो खुद को रोक पाएगा? ना । इसी को जो संभव कर दे उसी की बुद्धि स्थिर रहती है। अगर दुनिया की वस्तुएं आपको लुभा नहीं पाती तोह आप अपनी बुद्धि को नियंत्रण में ला पाएंगे
  7. संभव है, की हम दुनिया की विषयों में रुचि ना लें, इससे हम दुनिया से दूर तोह हो जाएंगे लेकिन दुनिया के प्रति उनकी आसत्ती नहीं जाती – मैन की इच्छा को खत्म करके, आसत्ति को खत्म करने से ही बुद्धि स्थिर होगी – अगर आप दुनिया की वस्तुओं को ना भी बोल देते हैं तोह भी क्या आपका मन उन्ही में लगा हुआ है? आसत्ती, इच्छा खत्म करनी है, तभी तोह मोह खत्म होगा । मैन के लगाव को ही मोह कहते हैं ।
  8. जहां आप अपनी आसत्ति, अपनी इच्छा खत्म नहीं करते वहां इन्द्रियाँ एक बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलपूर्वक अपने वश में कर लेती हैं, सोचिए , न जाने कितने ही बार ऐसा होता है, के सुख दुख आपके वश में नहीं, आप सुख दुख के वश में हैं, कभी हंसी नहीं रुकती, तोह कभी रोना नहीं रुकता, तोह कभी गुस्सा नहीं रुकता, कभी भूक नहीं रुकती, तोह कभी नींद, और कभी कामवासना भी नहीं रुकती
  9. इन्द्रियों को वश में करके, भगवान को ध्यान में रख जो बैठता है, अपने कर्म, अपने कर्तव्य में जो ध्यान लगाता है, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है, वो ईश्वर, अपने लक्ष्य के समीप हो जाता है – अगली बार आप कुछ भी करें तोह देखियेगा की वो काम आपकी इन्द्रियाँ आपसे करवा रही हैं, या आपका कर्म आपसे करवा रहा है – आप खुद ही समझ जाएंगे कि श्री कृष्ण क्या कहना चाहते हैं, इन्द्रियों के वश में न होकर, उन्हें अपने वश में करके ही आप अपनी बुद्धि को स्थिर कर पाएंगे
  10. विषयों के बारे में, अर्थात इच्छाओं के बारे में सोचते रहने से उसमें आसत्ति हो जाती है – और आसत्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है, और जब वो कामना पूरी नहीं होती तोह क्रोध उत्पन्न होता है – जिस तरह ज़्यादा खाने से भूक बढ़ती है, ज़्यादा सोने से नींद बढ़ती है, उसी तरह जब आप अपनी इच्छाओं के बारे में सोचते रहते हैं तब आप उन्ही में उलझ के रह जाते हैं – और उसे ही आसत्ती कहते हैं, आसत्ति के बढ़ने को, कामना कहते हैं, और कामने के न पूरा होने पर गुस्सा आता है, और तब आप अपनी समझ खो देते हैं
  11. सोचने की शक्ति कम हो जाती है, और जब सोच नहीं सकते तोह याद भी नहीं रख सकते, स्मृति में भ्रम हो जाने से, स्मृति यानी ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है, जब याद नहीं रख पाएंगे, टैब ज्ञान किसी काम नहीं आएगा, बुद्धि बेकार हो जाएगी, और बुद्धि का नाश हो जाने से पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है
  12. जो अपनी इच्छाओं को, अपनी आसत्ती को अपने नियंत्रण अर्थात control में रख पाते हैं, दोस्ती, शत्रुता, गुस्से या प्यार के बिना अपनी इन्द्रियों को भटकने नहीं देते , वो अंतःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होते हैं, ऐसे लोगों को बाहरी नहीं, हार्दिक और अंदरूनी प्रसन्नता होती है – आनंद, खुशी, शांति कहीं बाहर नहीं होती दोस्तों, वो तोह हमारे अंदर होती है और हम उसे ढूंढते बाहर हैं – मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे, में तोह तेरे पास
  13. अंदर से प्रसन्न होने पर दुख खत्म हो जाते हैं, और ऐसे प्रसन्नचित कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओरे से हटकर एक परमात्मा में ही भली भांति स्थिर हो जाती है – आप अपने लक्ष्य के बारे में औचिये, औचिये की उसे पूरी दुनिया में सबसे अच्छा, the best कैसे कर सकते हैं, और उसे पूरा करने में लग जाइए – फल का मत सोचिते, बस अपने कर्म को करते रहिए – और देखिए कैसी मानसिक शांति और सुकून मिलता है आपको
  14. जो पुरुष अपने मोह, आसत्ति या इच्छाओं को नहीं जीत पाते उनमें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती, यानी कि वो स्पष्ट और सतिक निर्णय नहीं ले पाते – ऐसे मनुष्य कस अंतःकरण में भावना भी नहीं होती, भावना हीन मनुष्य को अहंती नहीं मिलती, और शांति हीन मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है – बीमार आदमी को क्या अच्छा खाना और क्या बुरा खाना, उसे कुछ अच्छा नहीं लगता , जो अंदर होता है वो बाहर आता ही है, जब आपके अंदर शांति नहीं होगी तब आप आनंद कभी भी प्राप्त नहीं कर पाएंगे
  15. जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, जैसे हवा पानी में चलती हुई नाव की दिशा बदल देती है, वैसे ही विषयों में विचरती इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस आयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है, अगर वो क्रोध में है तोह और कुछ भी नहीं सोच पाएगा, और अगर वो प्रेम में है तोह और किसी बात की उसे सुध भी नहीं रहेगी, जिस भी इन्द्रिय के वश में होगा उसे उस इन्द्रिय के अलावा कुछ भी समझ नहीं आएगा, इन इन्द्रियों के नियंत्रण से निकल के इनको आप के नियंत्रण में रखिये दोस्तों फिर देखिए, आप के लिए कुछ भी असंभव नहीं रहेगा , सब कुछ संभव हो जाएगा
  16. जिस पुरुष ने इन्द्रियों और इन्द्रियों से होने वाली इच्छाओं पर पूरी तरह रोक लगा रखी हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है, और बुद्धि हमारा ध्यान ऐसी ऐसी जगह पर लेजाती हैं, जहां पर हम उलझ के अपना असली मकसद भूल जाते हैं । बुद्धि सहारा लेती है हमारी इन्द्रियों का, इसीलिए अगर बुद्धि पर विजय प्राप्त करनी है दोस्तों तोह इन्द्रियों को वश में करना ही होगा
  17. जो सेब के लिए रात्रि है, उस रात्रि में योगी ज्ञान के लिए, परमात्मा के लिए जागता है और साधना करता है और जो सबके लिए सांसारिक सुख है, जिसके लिए संसार में हर कोई जागता है, वओ सुख योगी के लिए रात के समान है। जब सब सोते हैं तब मेहनती बच्चा रात में जाग के पड़ता है और परीक्षा में वो ही अव्वल आता है
  18. नदियां समुद्र को विचलित नहीं करती, नदियां समुद्र में जा के समा जाते है, उसी तरह से स्थिर बुद्धि वाले पुरुष में सारी इच्छाएँ, सारे भोग समा जाते हैं और उसे विचलित नहीं करते। कोई आपको कुछ बुरा बोलता है और आप अपना आपा खो देते हैं, इसका मतलब आपका अपने आप पे नियंत्रण नहीं है, ऐसा नदी बनिये की कोई भी नदी, किसी भी तरह का गाली आपको विचलित न कर पाए, वही पुरुष परम शांति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं
  19. जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर, ममता रहित, अहंकार रहित और स्पृहा रहित विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है, अर्थात वो शांति को प्राप्त है। कामना का , इच्छा का त्याग करना है, उससे मोह नहीं रखना है, घमंड नहीं करना है, दुनिया में रहकर भी दुनिया से अलग रहना है, ऐसे ही इंसान को शांति प्राप्त होती है, कामयाब वही होता है जो परेशान हुए बिना, अपने धुन में, अपने काम में लगा रहता है, सफलता उसी के ही पांव चूमती है
  20. हे अर्जुन, ये ब्रम्ह को प्राप्त हुए पुरुष की स्तिथि है, इसको प्राप्त करके योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी ब्रम्हस्तिथि में स्थित होकर ब्रम्हानंद को प्राप्त हो जाता है। जो पुरुष ऐसा करने में कामयाब हो जाता है वो ब्रम्ह को प्राप्त हो जाता है, ब्रम्ह का मतलब है सबसे बड़ा सत्य, इससे आगे कुछ भी नहीं होता, ये जो सारे लक्षण है, उन लोगों के हैं, जो अपनी बुद्धि को स्थिर रखकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं, स्वाभाविक है कि अगर हम इन बातों को अपने जीवन में उतार लें तोह हम भी अपने लक्ष्य से ज़्यादा दूर नहीं रहेंगे।
  21. ये था भागवद गीता का दूसरा अध्याय संख्ययोग – इस अध्याय में भगवान श्री कृष्णा ने हमें कर्म को समझाया, कर्म के प्रति हमारे उत्साह को बढ़ाया, और ये समझाया कि सिर्फ और सिर्फ कर्म में ही अपना ध्यान रखना और किसी भी बात में नहीं

अध्याय 3 – कर्मयोग

कर्म तोह हर पल, हर समय, हम सब जरते हैं, ऐसा कोई क्षण संभव नहीं जब हम कर्म किये बिना रह सकें। कुछ कर्म झूठ और फरेब से भरे होते हैं, और कुछ कर्तव्य के लिए किए जाते हैं, तोह फिर ऐसे कोनसे कर्म हैं जो हमें हमारे लक्ष्य तक ले जाएंगे? उसी का analysis भगवान श्री कृष्ण हमारे लिए करेंगे और हमलोग आम जन जन की भाषा में उसे समझेंगे।

  1. अर्जुन पूछते हैं – हे जनार्दन अगर आपको कर्म के मुकाबले ज्ञान बेहतर लगता है, तोह फिर हे केशव मुझे ऐसे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं? – हमारे मन में भी न जाने कितनी ही बार ऐसे प्रश्न आते हैं कि कर्म आखिर क्यों करना
  2. भगवान श्री कृष्ण की बात सुनके अर्जुन की बुद्धि मोहित हो रही थी, समझने के बजाय वो और भी ज़्यादा उलझ जा रहा था – इसीलिए अर्जुन कहते हैं – एक बात बताइये प्रभु जिसपे में चल सकूँ, जिससे मेरी उलझन दूर हो सके, वो कहना चाहते हैं , भगवान confuse मत करिए
  3. भगवान श्री कृष्ण कहते हैं – इस दुनिया में दो प्रकार के निष्ठा, दो प्रकार के विश्वास हैं – एक है संख्या योग जिसका रिश्ता ज्ञान से है और दूसरा है कर्मयोग जिसका लेना देना सिर्फ कर्म से है – निष्ठा का अर्थ है कुछ भी करने की सबसे परिपक्व अवस्था , अपनी इन्द्रियों को अपने वश में कर परमात्मा में ध्यान लगाना ज्ञान योग से होता है, और इसको कहते हैं सन्यास या संख्या योग और दूसरा होता है कर्म योग, जिसका मतलब है निष्काम काम करके फल में आसत्ति ना रखना
  4. मनुष्य न तोह कर्मों को शूरी किये बिना निष्कर्मता अर्थात योग निष्ठा को प्राप्त होता है, और कर्मों को केवल छोड़ देने से सिद्धि यानी संख्या निष्ठा को प्राप्त होता है – दोस्तों ऐसा नहीं कि आप कर्म करें ही ना और स्वयं को सन्यासी कहें, ऐसे तोह दुनिया चल ही नहीं पाएगी – अपने कर्तव्य को छोड़ अगर आप सन्यासी बन जाते हैं और समझते हैं कि आपको मोक्ष मिल जाएगा – ना ये संभव नहीं है, ऐसा नहीं हो सकता कि आप अपने कर्मों को त्याग दें और खुद को कर्मयोगी कहें – कर्म को ना करने से या उसे हमेशा के लिए त्याग देने से कुछ भी हासिल नहीं होगा
  5. ऐसा हो ही नही सकता कि मनुष्य किसी काल में भी, क्षण मात्र के लिए भी बिना कर्म किये रह जाये – हमारी दुनिया ऐसी है, हम चाहे या ना चाहे कर्म तोह हमें करना ही पड़ेगा, कर्म ना करना भी कर्म ही है – जिस तरह प्रकृति ने हमे बनाया है उसका गुण यही है कि हम हर समय कर्म करें – प्रकृति में कभी कुछ रुकता नहीं, सांसें चलती हैं, समय चलता है, जीवन का चक्र, प्रकृति का चक्र चलता ही रहता है – जब तक जीवन रहेगा टैब तक कर्म भी रहेगा इसीलिए ये आवश्यक है कि कर्म को समझ जाए और उसे किया जाए
  6. जो सिर्फ दिखावा के लिए अपनी इंद्रियों को ऊपर ऊपर से रोककर लेकिन अंदर मैन से हमेशा उन्ही के बारे में सोचता है वह मिथ्याचारी अर्थात झूठा और घमंडी – खाना खाने से तोह मन कर दिया लेकिन खाने और उसके स्वाद के बारे में ही सोचता रहे तोह ये कैसा उपवास हुआ – इसे व्रत नहीं मन जाएगा – कितने ही साधु सन्यासी आपको मिलेंगे जो कहेंगे कि उन्होंने दुनिया को त्याग दिया है, कर्म को त्याग दिया है, लेकिन अगर उनके मन में इस दुनिया के लिए लालसा है, इच्छा है तोह कृष्ण उन्हें झूठा और पाखंडी बताते है
  7. हे अर्जुन जो मनुष्य सच्चे मन से अपनी इन्द्रियों को अपने वश में कर, उनसे बिना लगाव लगाए काम करता है, वोही कर्म योग का पालन करता है , वही श्रेष्ठ है, भगवान श्री कृष्ण कहना चाहते हैं कि इन्द्रियों को तोह अपने वश में करना ही है, साथ ही साथ मैन का उन इन्द्रयों से किसी भी विषय से लगाव नहीं होना चाहिए – उसे ही कर्मयोग मन जाएगा – जब इन्द्रियाँ वश में होती है तब आप कुछ भी कर सकते हैं, किसी भी तरह की बाधा, disturbance आपको रोक नहीं पाएगी । और अगर आप इन्द्रियों के वश में हैं तोह चाहे वो स्वादिष्ट खाने की महक ही क्यों न हो, कोई रूप सी नारी ही क्यों न हो, आसपास का शोर ही क्यों न हो, छोटी या बड़ी हर बाधा आपको आपका काम करने से रोकेगी
  8. हे अर्जुन तू केवल कर्तव्य निभा क्योंकि कर्म ना करने के मुकाबले कर्म करना बेहतर है, तथा कर्म ना करने से तेरा ज़िंदा रहना भी तोह possible नहीं – अर्थात तू शस्त्र उठा और युद्ध कर, अपना कर्म कर, क्योंकि ये कर्म ना करने से कहीं अच्छा है – कहने का मतलब है, की कर्म तोह बोहोत सारे हैं, लेकिन एक चुना हुआ है, उस चुने हुए कर्म को ही निर्धारित कर्म कहते हैं – अपनी मर्ज़ी से अगर आप कर्म चुन लेंगे तोह उसे निर्धारित नहीं माना जाएगा – आपको अपना कर्तव्य समझकर, अपना कर्म चुनना होगा – अथवा जो कर्म आपको मिला है उसे आपको कर्तव्य समझकर निभाना होगा
  9. यज्ञ वो होता है जिसमें सब लोग शामिल होते हैं – भगवान श्री कृष्ण कहते हैं – यज्ञ के लिए किए जाने वाले कर्मों से ही मनुष्य समुदाय कर्मों से बंधता है – इसीलिए अर्जुन तू इच्छाओं को छोड़कर उस यज्ञ के लिए ही भली भांति कर्म कर – यज्ञ यानी समाज और प्रजा की भलाई के लिए किया गया निस्वार्थ काम – हमको भी अपने कर्तव्यों को यज्ञ समझ ऐसे कामों में अपना योगदान देना चाहिए – जिससे समाज का भला हो – अगर हम सब अपने काम को यज्ञ समझ उसे सम्मानपूर्वक करें तोह सबका भला होगा, उसे ही आप निर्धारित कर्म भी मानिए
  10. प्रजापति ब्रम्हा नें इस दुनिया की शुरुवात में इस यज्ञ को रचकर अपनी जनता से कहा कि तुमलोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करेगा – घरों में जो यज्ञ किये जाते हैं उन्हें एक धार्मिक कर्म कांड ना समझकर उसकी importance समझनी चाहिए , यज्ञ हमारे संस्कारों का एक संगठित रूप है, संस्कार मतलब काम करने का सबसे उत्तम तरीका – यज्ञ से हम हर विधि को, संस्कार को, एकदम उचित तरीके से पूरा कर अपने कर्म को शुरू करते हैं, यज्ञ एक तरीके से हमें रास्ता दिखाता है, अगर आगे भी संस्कारों का पालन होगा तोह धेय, हमारा goal, aim, ज़रूर पूरा होगा
  11. ब्रम्हा कहते हैं कि यज्ञ से सब लोगों को, देवताओं को खुश करना चाहिए, और फिर वो देवता खुश होके, हम सबकी भलाई करेंगे – इस प्रकार निस्वार्थ भाव से एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे – यज्ञ तरीका है देवताओं को खुश करने का और उसके बदले में देवता आपको खुश रखते हैं, आपकी उन्नति करते हैं , इसीलिए काम शुरू करने से पहले, कुछ भी शुभ करने से पहले ईश्वर का नाम लेना विधान है, यही ईश्वर का नाम जब सही तरीकों, सही पद्धति, सही methods के साथ किया जाता है तोह उसे यज्ञ कहते हैं, यज्ञ को अपने और देवताओं के बीच का एक medium मान लीजिए जिससे दोनों के बीच संबंध बना रहता है।
  12. यज्ञ करके जब आप देवताओं की पूजा करते हैं – तब देवता आपके बिना मांगे ही आपकी सारी इच्छाओं को पूरा कर देते हैं – लेकिन जो यज्ञ नहीं करता, उस यज्ञ से देवताओं को रणाम नहीं करता लेकिन फिर भी अपनी इच्छाओं को पूरा करना चाहता है उन्हें चोर समझना चाहिए – कुछ देने से कुछ मिलता है, कुछ करने से कुछ मिलता है, बिना अर्ग, चढ़ाए, बिना पूजा किये अगर कोई चाहता है कि उसकी मनोकामना पूरी हो जाये, बिना कुछ काम किये अगर कोई सोचे के उसका काम बन जाये तोह इसे बईमानी या चोरी ही तोह कहा जायेगा
  13. यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं, और जो पापी लोग अपना शरीर पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं वे तोह पाप को ही खाते हैं, हम क्या सिर्फ खा के जिंदा रहने और मर जाने के लिए ही पैदा होते हैं? ऐसे जीवन का क्या मतलब हुआ, अपने जीवन का purpose, उसका उद्देश्य हमे समझना चाहिए, इस ब्रम्हांड नें हम क्यों हैं, क्यों हमें ईश्वर या मोक्ष को प्राप्त करना है, इन सब को समझने के लिए ही यज्ञ जैसे अनुष्ठान किये जाते हैं, जो लोग यज्ञ या ईश्वर को याद किये बिना सिर्फ अपने ज़िंदा रहने में लगे रहते हैं उन्हें चोर समझना चाहिए ।
  14. अगर अन्न खत्म हो जाये, तोह सब खत्म हो जाएंगे, सम्पूर्ण प्राणी जगत, हर कोई अन्न से उत्पन्न होते हैं। अन्न की उत्पत्ति बारिश से होती है, और बारिश यज्ञ से होती है, और यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होती है, और कर्म की उत्पत्ति वेद से । हमारी सृष्टि का सारा ज्ञान वेद से ही तोह आया है। कर्म क्या है? उसकी परिभाषा भी वेद से आयी है, और वेद परम पिता परमात्मा से उत्पन्न हुए हैं। वेद ईश्वर से आया ज्ञान है, वेद से आगे और वेद से बड़ा कुछ भी नहीं है – इससे ये सिद्ध होता है कि यज्ञ और ईश्वर में सीधा संबंध है।
  15. श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं -हे पार्थ, जो पुरुष परंपरा से नहीं चलता, जो सृष्टि चक्र, प्रकृति के नियमों का पालन नहीं करता, मतलब जो अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों के द्वारा भोगों में रमण करने वाला, पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है – ऐसा इंसान बस इन्द्रियों के वश में रहकर ज़िंदा रहता है। जीत है और मर जाता है। उसके जीवन मृत्यु का चक्कर चलता ही रहता है, चलता ही रहता है। ऐसे इंसान का जीने और मारने का कोई मतलब नहीं। वेदों में , ग्रंथों में जो ज्ञान, नियम बनाये हैं उनका एक खास मतलब है, और उस मतलब के अनुसार हमको अपना जीवन जीना चाहिए।
  16. श्री कृष्ण कहते हैं -जो मनुष्य आत्मा में ही रमन करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही संतुष्ट हो उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है, आत्मा का मतलब यहां सबसे बड़ा सच है, और जो सत्य को समझता है, सत्य में ही खुश रहकर सत्य में ही रहता है। उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है, जिसको ज्ञान प्राप्त हो चुका है, जो जीवन की सच्चाई जान चुका है, सिर्फ वोही ऐसा है जिसके लिए कर्तव्य का कोई मतलब नहीं, लेकिन ऐसा कोई लाखों करोड़ों में ही एक होता है, बाकी हम सब के लिए कर्तव्य ही सब कुछ है
  17. ऐसे महापुरुष जो आत्मा को, सच को जान चुके हैं, उनके लिए कर्म करने का कोई प्रयोजन रहता ही नहीं, ऐसे महापुरुष कर्म के बंधन से छूट चुके हैं, क्योंकि ये ज्ञानी इस दुनिया और उस ईश्वर को समझ चुके हैं, इनका स्वार्थ से कोई मतलब नहीं रहता, इसीलिए ये महापुरुष हमारे जैसे लोगों से एकदम अलग हैं, इनपर वो नियम लागू नहीं होते जो हमारे जैसे दुनियादारी में लगे लोगों पर लागू होते हैं ।
  18. हे अर्जुन इसीलिए तू लगातार अपनी आसत्ति, अपनी इच्छा को छोड़ कर हमेशा अपने कर्तव्य कर्म को ठीक तरह से करता रह – अपनी इच्छाओं को, अपनी कामनाओं को छोड़ कर सिर्फ और सिर्फ कर्तव्य को पूरा करने में लग जा – क्योंकि आसत्ति से, लगाव से छूट कर जो भी अपना कर्म करता है, वो मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है – कार्यव्य का रास्ता आसान नहीं होता, कितनी ही बार हम सबको लगता है कि सब कुछ छोड़ कर आराम करें, देर तक सोएं या मेहनत ना करें, लेकिन उससे कभी कुछ भी हासिल नहीं होता, ऐसा श्री कृष्ण समझा रहे हैं
  19. बोहोत से ऐसे लोग हैं जो कर्म करते हुए ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, बोहोत से ज्ञानी महापुरुष तोह ऐसे होते हैं जो आत्मा की सच्चाई को पहचान जाते हैं, लेकिन बाकी लोगों के लिए, सिर्फ कर्म ही एक रास्ता है अगर उन्हें जीवन में कुछ करना है तोह – अगर आप चाहते हैं कि आपके जीवन का कोई मतलब हो, जन्म लेना , ज़िंदा रहना और फिर मर जाना ऐसे बेकार जीवन से बचकर अगर आप कुछ करना चाहते हैं तोह आसत्ति यानी attachment से बचते हुए आपको सिर्फ अपना कर्म करना चाहिए, और अपने कर्तव्य को पूरा करना चाहिए
  20. Leader जो होता है ना, वो आगे चलता है, बकई सब पीछे पीछे, इसीलिए आपको ये फैसला करना है कि आप आगे चलने वाले हैं या पीछे – कृष्ण कहते हैं कि श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा वैसा ही आचरण करते हैं, वो जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य समुदाय उसी के समान बरतने लग जाता है – कहने का मतलब है, जो हमारे idols होते हैं हम उन्ही को follow करते हैं, किसी भी field को ले लीजिए, कुछ ऐसे लोग होते हैं जो उस field में सर्वश्रेष्ठ होते हैं, और पूरी दुनिया उन्ही के जैसा करने की कोशिश करती रहती है – लीडर एक होता है और followers अनगिनत, तोह दोस्तों आप क्या बनना चाहते हैं? आगे या पीछे? Leader या Follower?
  21. कृष्ण कहते हैं -हे अर्जुन, मेरा इन तीनों लोकों में कुछ भी कर्तव्य नहीं है, और ना ही ऐसी कोई वस्तु है जिसे मैं प्राप्त नहीं कर सकता, तोह भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ – श्री कृष्ण से बड़ा Leader कौन होगा दोस्तों, लेकिन वो भी कर्म करते हैं, वो भी कर्म करते हुए अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं, कृष्ण ने महाभारत में युद्ध लड़ने से मन नहीं किया, उनकी नारायणी सेना कौरवों के साथ थी, लेकिन वो खुद अर्जुन के साथ, वो अर्जुन के सारथी बने, जब कृष्ण अपना कर्म करके अपने कर्तव्यों को पूरा कर रहे हैं, तोह हम कौन होते हैं, हम क्या हैं? हम क्यों अपना कर्तव्य ना करें?
  22. कृष्ण कहते हैं -हे पार्थ, अगर मैं अपने कर्मों को करने में सावधानी ना बरतुं तोह बड़ा अनर्थ हो जाएगा – हर कोई श्री कृष्ण को follow करता है, अगर आपका leader ही कुछ नहीं करेगा, अगर भगवान ही कुछ नहीं करेंगे तोह मनुष्य तोह सब कुछ करना छोड़ देंगे – जो सबसे बड़ा होता है, leader होता है, सर्वश्रेष्ठ होता है, सब उसके पीछे चलते हैं – अब अगर श्री कृष्ण ऐसा सोचते कि मैं तो भगवान हूँ, और कर्म नहीं करूंगा , तोह उन्हें किसी को ज्ञान देने का क्या अधिकार रह जाता, ईश्वर होते हुए भी उन्होंने अपने हर कर्तव्य का पालन किया, कर्म से कभी पीछे नहीं हटे, उनके पग चिन्हों पर ही अब हमें चलना है, और कोशिश करनी है सर्वश्रेष्ठ बनाने की
  23. श्री कृष्ण बात रहे हैं – कि यदि मैं कर्म ना करूं तोह ये सब मनुष्य नष्ट भृष्ट हो जाएं और में संकरता का करने वाला होऊंगा तथा मेरी वजह से सारी प्रजा नष्ट हो जाएगी – अगर कृष्ण कर्म नहीं करेंगे तोह दोस्तों दुनिया खत्म हो जाएगी, मनुष्य नष्ट हो जाएंगे – सोचिये ये दुनिया उन्ही की तोह माया है, लीला है, खेल है , और जिसने खेल को रच है, अगर वोही अपना कर्म नहीं करेगा तोह दुनिया में क्या बचेगा, चाहे वोह ईश्वर हो या साधारण इंसान, नियम तोह सब पर लागू होते हैं, अगर कर्म का नियम है तोह वो कृष्ण को भी करना पड़ेगा और हमें और आपको भी
  24. हे भारत, जिनमे समझ नहीं होती ना, वो कर्म में आसत्त होकर काम करते हैं, विद्वानों को और समझदारों को बिना लगाव के कर्म करना चाहिए। क्या यज्ञ करने से हम ज्ञानी हो जाते हैं? कर्म को सही विधि करने से क्या हम ज्ञानी हो जाते हैं, कर्म करना है लेकिन उससे आसत्ति, attachment नहीं रखनी है और ऐसा करना आसान नहीं है, अगर कोई ऐसा ज्ञानी है, जिसका कर्मों से कोई लेना देना नहीं, जैसे कि साधु सन्यासी, जिनकी कर्म में आसत्ति नहीं, तोह ऐसे लोगों को समाज सेवा में लग जाना चाहिए – ये उनके लिए कहा गया है जिनको लगता है कि दुनिया छोड़ सन्यासी बनने से उन्हें भगवान या सत्य की प्राप्ति हो जाएगी
  25. जो ज्ञानी हैं, जिन्हें ईश्वर की सच्चाई मालूम हो चुकी है, उनकी ये ज़िम्मेदारी बन जाती है, के उनके काम करने के तरीके सेकहीं किसी और के मन में कर्म के प्रति अश्रद्धा, अपमान, ये सब पैदा ना हो जाए, आप किसी ज्ञानी को देख ये सोच सकते हैं के वो कुछ करते ही नहीं, तोह मैं भी ना करूं, इसीलिए ये उन ज्ञानियों, उन महापुरुषों के लिए ज़रूरी है के वो ऐसा उदाहरण उनके सामने रखे जिससे हर कोई अपना कर्म, अपना कर्तव्य करने के लिए प्रेरित हो – दोस्तों , साधु को देख अगर सब अपना घर बार और दुनिया छोड़ने लगे तोह दुनिया चल नहीं पाएगी
  26. हर इंसान की एक प्रकृति होती है, रक नेचर होता है, अपनी उस प्रकृति के अनुसार ही वो कर्म करता है, हर कर्म उस प्रकृति के गुण के हिसाब से ही होता है – जिसके अंदर घमंड भरा होता है वो सोचता है के मैं करता हूँ, मतलब के करने वाला वो है, ऐसा सोचने वाले को अज्ञानी कहा गया है – आप जो भी काम करते हैं, उस काम को करवाने वाली आपकी प्रकृति है, उस प्रकृति के गुण हैं, कितनी ही बार ऐसा होता होगा के गुस्से में आप कुछ ऐसा कर जाते हैं जो आप नहीं करना चाहते थे, वो आपका क्रोध आपसे करवा देता है – सोचिये और समझने की कोशिश करिए कि आपकी प्रकृति क्या है
  27. सात्विक, राजसिक और तामसिक – तीन तरह की प्रवृत्तियां होती हैं, फिर उनके गुण विभाग और कर्म विभाग होते हैं – इस तरह से समझ लीजिए के अलग अलग nature के attributes होते हैं – इन्ही गुणों के वजह से आप कर्म करते हैं, जसे, अगर तामसिक गुण रहेगा गोह आप आलास या नींद, य इसी तरह के बुरे कर्म करेंगे, राजसिक गुण वाला बात बात पर शौर्य बहादुरी दिखाने की कोशिश करेगा, जो ज्ञानी होते हैं वो जानते हैं के वही गुण उनसे कर्म करवा रहे हैं – और जो ज्ञानी नहीं होते, हम जैसे ज़्यादातर लोग, वो समझते हैं, सब कुछ वोही कर रहे हैं
  28. कर्म में लगे हुए ज्ञानियों को ये जानना चाहिए के गुण ही उनसे कर्म करवाते हैं, वो खुद कुछ भी नहीं करते, आर जब ज्ञानी इस बात को समझ लें, तोह ये उनकी जिम्मेदारी होती है कि वो अज्ञानियों को समझाएं के कर्म ही उनका धर्म है – ज्ञानी अर्थात के पहुंचे हुए लोग, वे ये बात जान जाते हैं के उनके अंदर के गुण आते जाते रहते हैं, बडालते रहते हैं, और इन्ही गुणों के अनुसार उनके कर्म भी बदलते रहते हैं, इसीलिए वो इन कर्मों को करने वाला खुद को कभी नहीं मानते हैं, बस काम करते हैं और बाकी सब कुछ, ईश्वर को सौंप देते हैं – दोस्तों हमें भी बस कर्म करके बाकी सब कुछ भगवान पर छोड़ देना चाहिए
  29. कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, के तू मुझे अंतर्यामी आत्मा में, आने सारे कर्मों को अर्पण कर दे, आशा को छोड़, मत को छोड़, और दुख को दूर करके युद्ध कर – दोस्तों, आने सारे कर्म हमें भगवान को सौंप देने चाहिए, कोई आशा नहीं, ममता नहीं और कोई दुख नहीं, कुछ भी भाव नहीं होना चाहिए, तू जा बस युद्ध कर, इसी को आप formula मान लीजिए सफलता का, जी हां सफलता का, कुछ भी करने का, आगे बढ़ने का, आशा, ममता, दुख, ब कुछ भूल के बस काम में लग जाइए और उन्नति करते जाइये
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